शनिवार, 21 जून 2014

बगैर कोई कार्य किए ग्रहण नहीं करते ‘अन्न’

कहते हैं कि जब कोई बीमारी, शरीर को जकड़ती है तो फिर जीवन अंधकारमय हो जाता है और जीवन बोझ लगने लगता है, मगर इनसे परे बीमारी के बाद भी जिंदादिली दिखता है, चांपा इलाके के सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों में। एक ओर जहां कुष्ठ पीड़ितों के समक्ष भिक्षावृत्ति के सिवाय, और कोई रास्ता नहीं रहता। ऐसी स्थिति से जूझते हुए आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने नई मिसाल पेष की और यह भी बताया कि कोई भी परिस्थिति आ जाए, लेकिन स्वाभिमान को जिंदा कैसे रखा जाए। यहां कुष्ठ पीड़ितों का मनोबल बढ़ाने में आश्रम प्रबंधन के योगदान की जितनी तारीफ की जाए, कम ही होगी।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 15 किमी दूर सोंठी गांव में स्थित है कुष्ठ आश्रम। इस कुष्ठ आश्रम में 150 से अधिक कुष्ठ पीड़ित रहते हैं। इनमें से अधिकतर की उम्र 60 के पार जा पहुंची है, फिर भी इन कुष्ठ पीड़ितों में अपने कर्म के प्रति कर्मठता देखते ही बनती है। इनमें से अधिकांष कुष्ठ पीड़ित,  छत्तीसगढ़ के ही हैं। कइयों को आश्रम में रहते 25 से 30 साल हो गए हैं। आश्रम में रहने वाले कुष्ठ पीड़ितों के बीच आपस में इतना अपनत्व है कि वे एक-दूसरे के सहयोग के लिए हमेषा आतुर नजर आते हैं। भाई-बंधुत्व की भावना आश्रम में साफ नजर आती है, जिसके कारण कुष्ठ पीड़ितों का मन, इस आश्रम में रमा हुआ है।
खास बात यह है कि आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने स्वाभिमान की मिसाल पेष की है। दरअसल, कुष्ठ पीड़ितों में चाहे वह पुरूष हो या महिला, सभी कुछ न कुछ कार्य जरूर करते हैं और इस तरह वे बगैर कोई कार्य किए, अन्न ग्रहण नहीं करते। हर सुबह कुष्ठ पीड़ितों में यही परिपाटी नजर आती है और यह सिलसिला कोई दो-चार साल पुरानी नहीं है, बल्कि जब से आश्रम शुरू हुआ है, तब से कुष्ठ पीड़ित अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य करते आ रहे हैं।
आश्रम में कुछ महिला कुष्ठ पीड़ित, जहां चावल में कंकड़ बिनने का काम करती हैं तो कुछ जैविक खाद बनाने में योगदान देती हैं। साथ ही कई महिलाएं, आश्रम की गौषाला में काम करती हैं। इसके साथ ही आश्रम में कोई चाक बनाता है तो कोई दरी। महत्वपूर्ण बात यह है कि रसोई की जिम्मेदारी भी कुष्ठ पीड़ित महिलाएं संभालती हैं। यह कुष्ठ पीड़ितों की रोज की दिनचर्या में शामिल है और कुछ न कुछ काम करने के बाद, कुष्ठ पीड़ितों के चेहरों में एक आत्मसंतोष भी दिखता है। 
कुष्ठ पीड़ित मानते हैं कि रोजाना कोई न कोई काम करने से शरीर को फायदा है ही, साथ ही आश्रम का काम भी हो जाता है। साथ ही आश्रम के विकास में उनका योगदान भी शामिल हो जाता है। आश्रम की व्यवस्था से सभी कुष्ठ पीड़ित खुष नजर आते हैं और वे आश्रम के सुखद माहौल से काफी आषान्वित नजर आते हैं।
सोंठी कुष्ठ आश्रम के सुधीर जी कहते हैं कि आश्रम में परिवार का माहौल है। ऐसी परंपरा की शुरूआत संस्था के संस्थापक स्व. सदाषिव गोविंद कात्रे जी ने की थी। परिवार की भावना होने के कारण सभी को लगता है कि यह मेरा है और उसी पारिवारिक भावना के कारण सभी लोग, अपना कुछ न कुछ योगदान देना चाहते हैं। सभी के लिए व्यवस्थाएं एक जैसी हैं। जो आश्रम में रह रहे हैं, वही लोग यहां की व्यवस्थाओं को संभाल रहे हैं।
निष्चित ही, सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने समाज के सामने अपने स्वाभिमान को जिस तरह जीवंत बना रखा है, वह समाज की सबसे बड़ी बुराई भिक्षावृत्ति पर तमाचा है। कई कुष्ठ पीड़ित, धार्मिक जगहों और फुटपाथों पर भिक्षावृत्ति को अपनी किस्मत समझते हैं, उन्हें सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों से सीखने की जरूरत है। साथ ही समाज के लोगों को भी कुष्ठ पीड़ितों के मनोबल को बढ़ाने के लिए आगे आना होगा, तब कहीं जाकर कुष्ठ रोग के प्रति,  समाज में व्याप्त संकीर्ण मानसिकता भी खत्म होगी।

समाज की मुख्यधारा से जुड़ने लगे कुष्ठ पीड़ित
समाज में कुष्ठ रोगियों के लिए मानसिकता अच्छी नहीं रही है। षिक्षा और जागरूकता के बाद अब कुष्ठ पीड़ितों के प्रति धारणा बदली है। यही वजह है कि कुष्ठ पीड़ित भी अब समाज की मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं। कुष्ठ पीड़ितों के उत्थान में सोंठी के आश्रम प्रबंधन ने बड़ी भूमिका निभाई है, जिसका परिणाम अब सबके सामने हैं। जिन कुष्ठ पीड़ितों को लाचार समझा जाता था, वे आश्रम में ऐसे-ऐसे कार्य करते हैं, जिसे देख और सुनकर सहसा विष्वास नहीं होता। कात्रे जी ने जो बुनियाद डाली थी, उसे गणेष दामोदर बापट ने मजबूत करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है। जिसके कारण आज कुष्ठ पीड़ितों का आत्मबल और स्वाभिमान बढ़ा नजर आता है।
कुष्ठ रोग को ‘साध्य’ मानकर अक्सर लोग, कुष्ठ रोगियों से दूरी बनाते थे, लेकिन षिक्षा के प्रसार और जागरूकता ने लोगों की सोच में काफी बदलाव किया है। हालांकि, कुष्ठ पीड़ितों को समाज में वह सम्मान नहीं मिल रहा है, जितना उन्हें मिलना चाहिए। बावजूद, कुष्ठ रोगियों ने इन स्थितियों से मुकाबला करते हुए अपने जीवन के लिए नया रास्ता तैयार किया है। कुष्ठ पीड़ितों ने ठाना है कि वे किसी पर बोझ नहीं बनेंगे और यही वजह है कि सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ित, अनेक कार्यों में पारंगत हो गए हैं।
सोंठी आश्रम में रहने वाले कुष्ठ पीड़ित, दरी से लेकर चाक और जैविक खाद बनाते हैं। इसके अलावा गौषाला की देखरेख के अलावा हॉलर मिल भी आश्रम में रहने वाले कुष्ठ रोगी ही चलाते हैं। साथ ही आश्रम के लोगों के कपड़ों की सिलाई करने वाला व्यक्ति भी कुष्ठ पीड़ित ही है,  इन कुष्ठ रोगियों के जज्बे के आगे सामान्य लोगों के भी पसीने छूट जाए।
आश्रम में 20 साल से रह रहे जगदीष श्रीवास बताते हैं कि वे दरी बनाने का काम करते आ रहे हैं। आश्रम का माहौल, घर जैसा ही है। यहां तक कि घर से भी अच्छा है। आश्रम में पूरा सम्मान मिलता है।
इसी तरह आश्रम में चाक बनाने वाले दयाराम यादव कहते हैं कि सभी कुष्ठ पीड़ित अपने-अपने स्तर पर काम करते हैं। हम लोग चाक बनाते हैं। बारिष के बाद चाक बनाना बंद हो जाएगा। इसके बाद सीमेंट की बोरी के धागे से रस्सी बनाने का काम करते हैं।
टेलरिंग का काम करने वाले विनोद नायक को आश्रम, घर के समान ही लगता है। सभी लोग परिवार के सदस्य लगते हैं और सबसे पारिवारिक रिष्ता हो गया है। विनोद बताते हैं कि आश्रम में काम करने से शरीर में स्फूर्ति रहती है। इलाज तो निरंतर जारी रहता है।
आश्रम में रहने वाली कुष्ठ पीड़ित महिलाएं भी अपना योगदान देने में कहीं भी पीछे नहीं है। कुछ महिलाएं जहां चावल बिनती हैं या फिर गौषाला से गोबर उठाती हैं, वहीं एक महिला हैं, गणेषी बाई, जो आश्रम में बनने वाली जैविक खाद की जिम्मेदारी संभालती हैं। जैविक खाद बनाने के लिए वह रोजाना कुछ न कुछ कार्य करती हैं और उसके साथ 2 अन्य महिलाएं भी काम करती हैं। इस तरह गोबर और गीले कचरे से खाद बनाई जाती है।
सोंठी कुष्ठ आश्रम के सुधीर जी कहते हैं कि सभी अपनी क्षमता के हिसाब से कार्य करते हैं, आश्रम में कोई बाध्य नहीं है। कुछ नहीं कर पाते, वह भी आश्रम परिसर की साफ-सफाई कर देते हैं। कई कुष्ठ पीड़ित हैं, जो भगवान की भक्ति में रमे रहते हैं।
सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने तमाम झंझावतों और सामाजिक दूरियों के बाद भी अपने स्वाभिमान का जो दमखम दिखाया है, वह निष्चित ही बड़ी बात है। जिन कुष्ठ पीड़ितों को समाज द्वारा आत्मबल देना चाहिए, वही समाज कहीं न कहीं, उनसे दूर नजर आता है, फिर भी कुष्ठ पीड़ितों ने इन बातों को भुलकर सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया है। साथ ही खुद की क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए आश्रम को भी आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया है।

स्व. सदाषिव गोविंद कात्रे जी का अहम योगदान
चांपा इलाके के सोंठी गांव में भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना करने वाले सदाषिव गोविंद कात्रे, खुद भी कुष्ठ से पीड़ित थे। यही वजह रही कि उन्होंने कुष्ठ पीड़ितों के दर्द को समझा और 1962 में कुष्ठ आश्रम की शुरूआत की। छह दषक पहले कुष्ठ पीड़ितों को दर्द को हरने को जो कोषिषें की गई थीं, निष्चित ही काफी हद तक कामयाबी मिली है। कुष्ठ पीड़ितों के लिए कात्रे जी ने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जिन्हें आज भी आश्रम में रहने वाले कुष्ठ पीड़ित याद करते हैं। वर्तमान में गणेष दामोदर बापट की देखरेख में आश्रम का संचालन हो रहा है।
छह दषक पहले कुष्ठ पीड़ितों को हेय की दृष्टि से देखा जाता था और कुष्ठ को ‘साध्य’ रोग मानकर कुष्ठ पीड़ितों से हर कोई दूरियां बनाता था। 1960 में जब कात्रे जी चांपा आए तो कुष्ठ पीड़ितों की दुर्दषा देखकर उन्होंने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना की और कुष्ठ पीड़ितों की सेवा में लग गए। शुरूआत में 2-3 कुष्ठ पीड़ित ही कात्रे जी के साथ रहते थे। इस दौरान कात्रे जी स्वयं साइकिल से गांव-गांव जाते और लोगों से एक मुट्ठी चावल सहयोग मांगते। साथ ही कुष्ठ के प्रति लोगों के भ्रम को भी दूर करने की कोषिष करते। इसी बीच कात्रे जी के परिश्रम और दृढ़ इच्छा शक्ति को देखकर एक समाजसेवी ने आश्रम निर्माण के लिए एक एकड़ जमीन, झोपड़ी और कुंआ दान किया। इस तरह आश्रम का संचालन शुरू हुआ और फिर आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों के सहयोग के लिए बहुत से हाथ आगे आए। खास बात यह है कि कात्रे जी गांव-गांव, जब जाते तो लोग उनकी सराहना करते, लेकिन कुछ लोग सामाजिक बेड़ियों के चलते सहयोग नहीं कर पाते थे। धीरे-धीरे ऐसे लोग भी कुष्ठ पीड़ितों की मदद के लिए सामने आए। जिसका परिणाम है कि कुष्ठ पीड़ितों के प्रति जहां लोगों की सोच में काफी बदलाव आया है और साथ ही चिकित्सा ज्ञान बढ़ने से कुष्ठ रोग ‘असाध्य’ होने की भी जानकारी सामने आई।
उधर आश्रम में जैसे-जैसे कुष्ठ पीड़ितों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे आश्रम में भी विकास के काम होते गए। इसी वक्त कुष्ठ पीडितों ने ही आश्रम के किनारे एक तालाब की खोदाई की, जिसे आज ‘माधव सागर’ के नाम से जाना जाता है। दूसरी ओर आश्रम के संस्थापक रहे स्व. सदाषिव गोविंद कात्रे के संस्मरण में समाधि स्थल का भी निर्माण किया गया है। समाजसेवा के लिए दिए गए कात्रे जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वर्तमान में गणेष दामोदर बापट पर आश्रम के संचालन की जिम्मेदारी है। उन्होंने भी कुष्ठ पीड़ितों के हितों के लिए काम करने में ता-उम्र गुजार दी। उम्र के अंतिम पड़ाव के बाद भी बापट जी आज भी कुष्ठ पीड़ितों की सेवा में लगे हुए हैं।
सोंठी आश्रम के सुधीर कहते हैं कि कात्रे जी स्वयं कुष्ठ से पीड़ित थे, इसलिए वे कुष्ठ पीड़ितों के दर्द को जानते थे। कुष्ठ पीड़ितों के लिए पेट भरने के लिए ‘भिक्षावृत्ति’ एक ही रास्ता था। कात्रे जी चाहते थे कि कुष्ठ रोगी भिक्षावृत्ति से दूर हो और स्वाभिमान से जीए।
सोंठी आश्रम के सुधीर जी मानते हैं कि कुष्ठों के उत्थान और आश्रम को अग्रसर करने में समाज का बड़ा योगदान है। प्रारंभ में ही समाज के लोगों ने कात्रे जी को संबल दिया। कात्रे जी को एक मुट्ठी चावल के साथ हर महीने 1 रूपये सहयोग देते थे। समाज के बल पर ही आश्रम ने यह रूप हासिल किया है। शासन से भी मदद मिलती है।
सोंठी के भारतीय कुष्ठ निवारक संघ द्वारा कुष्ठ पीड़ितों की सेवा के अलावा सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन किया जाता है। आश्रम परिसर में कई साल नेत्र षिविर लगाए गए, जहां हजारों लोगों को लाभ हुआ है। इसके साथ ही षिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय कुष्ठ निवारक संघ महती भूमिका निभा रहा है। आश्रम के पिछले हिस्से में सुषील विद्या मंदिर संचालित है, जहां कक्षा 8 वीं तक के बच्चे पढ़ाई करते हैं। अहम बात यह है कि आश्रम के अंतर्गत सुषील बालक छात्रावास भी है, जहां छग के अलावा मध्यप्रदेष, पष्चिम बंगाल और झारखंड के बच्चे भी पढ़ते हैं। बालक छात्रावास में 74 बालक हैं, जिनमें 40 बच्चे ऐसे हैं, जो कुष्ठ पीड़ितों के परिवार के हैं। अन्य बच्चे गरीब परिवार के हैं। आश्रम द्वारा 1986 में सुषील बालक छात्रावास को शुरू किया गया था और इस संस्थान को कुष्ठ पीड़ितों के परिवार के उत्थान के लिए शुरू किया गया था, जो आज भी अनवरत जारी है।
कुष्ठ पीड़ितों के स्वास्थ्य की भी भारतीय कुष्ठ निवारक संघ को शुरू से ही चिंता रही है, जिसके कारण आश्रम परिसर में ही एक हॉस्पिटल खोला गया है, जहां हर दिन कुष्ठ पीड़ितों का इलाज होता है। जिन कुष्ठ पीड़ितों की समस्या बड़ी होती है, उनके इलाज के लिए बीच-बीच में दूसरे शहरों से भी विषेषज्ञ डॉक्टर पहुंचते हैं। इस तरह आश्रम में कुष्ठ पीड़ितों के जीवन को संवारने के लिए हर स्तर पर प्रयास हो रहा है, जिसकी बानगी आश्रम में पहुंचते ही देखने को मिलती है।

सोमवार, 16 जून 2014

देश के लिए ‘कर्ज’ चुकाने का शुरूर, खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक आय-व्यय के सर्वे में खुलासा हुआ है कि भारत के हर नागरिक पर 33 हजार का कर्ज है और जन्म लेते ही हर व्यक्ति 33 हजार रूपये के कर्ज तले दबा रहता है। इतना जरूर है कि कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष तौर पर कर्ज नहीं लिया रहता, मगर देश के नागरिक होने के कारण हर व्यक्ति पर स्वाभाविक तौर पर ‘कर्ज’ होना, माना जा सकता है।
जिले के विकास मिश्रा ने देष हित में अपने कंधे से कर्ज उतारने का प्रयास शुरू किया है और उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष में 33 हजार का चेक भी भेजा है। फिलहाल, इस दिषा में किसी तरह की पहल नहीं हो सकी है। यही वजह है कि विकास मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और इस मसले पर विचार करने, कोर्ट में रिट पिटीषन अपने अधिवक्ता के माध्यम से दायर किया है।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी की गई सर्वे रिपोर्ट के मीडिया में प्रकाषित होने के बाद, जांजगीर इलाके के सिवनी गांव निवासी विकास मिश्रा ने तय किया कि प्रत्येक व्यक्ति पर 33 हजार का जो कर्ज बताया जा रहा है, उसे वह देश हित में अपने कंधे से उतारेगा। विकास ने दो साल पहले यानी 09 जनवरी 2012 को भारतीय स्टेट बैंक जांजगीर शाखा से 33 हजार रूपये का चेक प्रधानमंत्री राहत कोष के नाम से जारी कर कलेक्टोरेट में आवदेन के साथ जमा किया है। उसी दौरान एक पत्र के माध्यम से विकास को बताया गया कि उनके आवेदन और चेक को भेज दिया गया है, लेकिन इतना वक्त गुजरने के बाद भी अभी तक प्रधानमंत्री राहत कोष में भेजे गए चेक के बारे में कुछ पता नहीं चल सका है।
विकास मिश्रा का यह पहला प्रयास नहीं था, इससे पहले विकास ने देष के कई नेताओं समेत वित्त मंत्री और राष्ट्रपति को चेक भेजा, लेकिन कुछ नेताओं ने जवाब दिया और कुछ ने जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा। विकास को राष्ट्रपति और वित्तमंत्री का भी जवाब नहीं मिला और न ही, चेक वापस आया। इस दौरान विकास ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, तत्कालीन केन्द्रीय राज्यमंत्री डॉ. चरण दास महंत, क्षेत्रीय सांसद कमला देवी पाटले और जिले के तत्कालीन प्रभारीमंत्री दयालदास बघेल को पत्र भेजकर पहल करने की फरियाद की। इसमें मोतीलाल वोरा का जवाब आया और उन्होंने विकास को प्रधानमंत्री राहत कोष में चेक भेजने की सलाह दी।
कुछ लोगों ने भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रिपोर्ट जारी करने के कारण चेक आरबीआई को भेजने की सलाह दी तो विकास ने 33 हजार का चेक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नाम से प्रेषित किया। खास बात यह है कि विकास के पत्र का जवाब देते हुए आरबीआई ने विकास मिश्रा के प्रयास की सराहना की। हालांकि, आरबीआई ने कर्ज मुक्ति के लिए भेजे जा रहे चेक के लिए उपयुक्त कार्यालय से पत्राचार करने की बात कही।
फिलहाल, विकास मिश्रा का मकसद अधूरा है, परंतु वह जी-जान से देष हित में अपने कंधे से ‘कर्ज’ उतारने की कोषिष में लगा है। विकास के मन में एक तरह से शुरूर सवार है कि जैसे भी करके हिन्दुस्तान के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उन्हें ‘कर्ज’ उतारना ही है। विकास, इसे अपना सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य मानकर अनवरत कर्ज मुक्ति के लिए लगे हुए हैं।

रिपोर्ट ने विकास को झकझोरा...
देष में नागरिकों पर कर्ज की रिर्पार्ट कई बार मीडिया में आती रही है, लेकिन यही रिपोर्ट विकास मिश्रा ने देखी और उन्हें इस रिपोर्ट ने झकझोर कर रख दिया और उन्होंने ठाना कि वे अपने हिस्से का कर्ज उतारेगा।
विकास, अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट रहा है कि वह उस ऋण से उऋण होना चाहता है, जिसे उसने खुद उधार नहीं लिया है। देश का एक जिम्मेदार बासिंदा होने के कारण उन्होंने तय किया कि वह हर हाल में अपना फर्ज निभाएगा और देश के ‘कर्ज’ को खत्म करने बीड़ा उठाया है। इस तरह वह दो साल से हर कहीं चक्कर काट रहा है, किन्तु उसका 33 हजार का चेक लेने, कोई तैयार नहीं है।
मीडिया में रिपोर्ट देखने के बाद विकास ने कर्ज उतारने का मन बनाया। वे तय नहीं कर पा रहे थे, कर्ज उतारने के लिए राषि किसे भेजा जाए ? इसके बाद विकास ने कलेक्टर से भेंट की और भारत सरकार को भेजने के लिए 33 हजार का चेक सौंप दिया। इस दौरान विकास ने सीएम डॉ. रमन सिंह से भी मुलाकात की थी, किन्तु अब भी विकास को कर्ज मुक्ति का इंतजार है। विकास ने कई जगहों पर चेक भेजा, लेकिन अधिकांष वापस आ गए।
दूसरी ओर कई लोग ऐसे हैं, जो उनकी मंशा को नहीं समझ रहे हैं। विकास मिश्रा के इस तरह के नायाब प्रयास की प्रशंसा ही की जा सकती है, क्योंकि इस तरह की कोशिश देश भर में हो और हर नागरिक इसी मंशा से काम करे तो देश, कर्ज से मुक्त हो जाएगा। विकास मानते हैं कि देष में आने वाले दिनों में व्यापक असर होगा, क्योंकि बहुत से लोग हैं, जो देष में कर्ज उतारने के लिए आतुर हैं।
यह सही है कि विकास की कोषिष यदि रंग लाती है तो सिवनी गांव के अलावा इलाके के और भी युवा हैं, जो चाहते हैं कि देष के लिए वे भी अपने कंधे से कर्ज उतारेंगे। साथ ही ये युवा, विकास के प्रयास की सराहना करते नहीं थकते और उन्हें विष्वास है कि आने वाले दिनों में विकास को सफलता मिलेगी।
देश का कर्ज उतारने का शुरूर लिए, विकास मिश्रा भटक रहे हैं, उन्हेें समझ भी नहीं आ रहा है, वे क्या करें ? बस, वे खुद को कर्ज से मुक्त करना चाहते हैं। विकास मिश्रा कहते भी हैं कि इस तरह के प्रयास वे कर रहे हैं, इसके बाद उन्हें आशा है कि और भी लोग आगे आएंगे।

रिट पिटीषन दायर, विचाराधीन
विकास मिश्रा पूरे दमखम के साथ देश के नाम खुद के कर्ज को उतारने में हर स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। इतना जरूर है कि उन्हें किसी प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि का सहयोग नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि विकास मिश्रा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विकास ने ‘कर्ज मुक्ति’ के लिए अपने अधिवक्ता के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में रिट-पिटीषन दायर किया है। फिलहाल, मामला विचाराधीन है।
ये अलग बात है कि अफसर, विकास मिश्रा के सहयोग के लिए सीधे तौर पर आगे नहीं आ रहे हैं, मगर देश के प्रति उनके समर्पण और जुनून की तारीफ किए बगैर नहीं पा रहे हैं। आम लोग भी उनकी कोशिश की सराहना कर रहे हैं और इस तरह की मिसाल, देश के हर नागरिक को पेश करने की बात भी उठने लगी है। छोटे से गांव सिवनी से शुरू हुआ यह प्रयास, दिल्ली के गलियारों तक पहुंच गया है।
विकास को अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार है। विकास को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर पूरा भरोसा है और उन्हें आस भी है कि देष हित में कोई बड़ा निर्णय होगा। उनके मुताबिक, देष का यह अनूठा मामला है। अपने आप में देष का यह पहला प्रयास है।
विकास मिश्रा कहते हैं कि यह प्रयास, देष के नागरिकों को संदेष देने का है और देष को कर्ज से मुक्त किया जाए। सरकार गलत नीतियां बना रही है। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। देष की अर्थव्यवस्था बिगड़ रही है। देष को सुचारू तौर चले, बस यही प्रयास है। देष की 50 फीसदी से अधिक आबादी गरीब है, ऐसे में सरकार ऐसी नीतियां बनाए, जिससे देष का कोई भी नागरिक कर्जदार न हों।
विकास मिश्रा ने जिस तरह से अनूठा प्रयास किया है और करोड़ों भारतीयों को जोड़ने की कोशिश हुई है। देश के ‘कर्ज’ को चुकाने की सोच ने, टैक्स चोरी करने वाले उन लोगों पर तमाचा जड़ा है, जो देश हित को दरकिनार कर विकास कार्य को अवरोध करने के लिए टैक्स चोरी करते हैं। निश्चित ही इस पहल के बाद लोगों में जागरूकता आएगी और देश के प्रति सेवा भावना भी जागृत होगी।

परिवार और दोस्तों से मिला संबल
देष के लिए कर्ज से मुक्ति के लिए की जा रही विकास मिश्रा की कोषिष को परिवार के समर्थन से भी बल मिल रहा है। विकास द्वारा कर्ज चुकाने के कार्य में परिवार के सभी लोग साथ हैं, वहीं विकास के दोस्तों ने भी उसका उत्साह हमेषा बढ़ाया है।
देष की आबादी करीब ढाई अरब पहुंच गई है और भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से पता चलता है कि देष का प्रत्येक नागरिक 33 हजार हजार के कर्ज से डूबा है। ये अलग बात है कि प्रत्यक्ष तौर पर देष के किसी व्यक्ति ने खुद कर्ज नहीं लिया है, किन्तु देष में जो कर्ज है, वह कहीं न कहीं, अवाम पर ही बोझ है। ऐसे में कोई इन ढाई अरब लोगों में से निकलकर अपने कंधे से देष के लिए कर्ज उतारने के बारे में सोचे तो, इस मंषा का स्वागत होना चाहिए।
विकास मिश्रा ने दो साल पहले आरबीआई की रिपोर्ट देखकर देष हित में खुद के कर्ज को उतारने का ठाना है और वह इसमें कटिबद्ध भी नजर आ रहा है। विकास को उसके परिवार के लोगों को भरपूर सहयोग मिल रहा है। यही कारण है कि बिना थके-बिना रूके, पूरे उत्साह से कर्ज मुक्ति की कोषिषों में कोई कमी नहीं कर रहे हैं। यहां तक विकास ने मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है।
विकास बताते हैं कि परिवार में चार सदस्य हैं, कर्ज के बारे में बताया तो सभी लोगों ने कर्ज मुक्ति का समर्थन किया। सभी चाहते हैं कि देष के नाम पर कर्ज उतारने का प्रयास जारी रहे।
विकास के छोटे भाई ओमप्रकाष मिश्रा कहते हैं कि परिवार का पूरा सहयोग है और वे मदद भी कर हैं। उन्हें अफसोस है कि देष हित में किए जा रहे प्रयास को भी न तो अफसर मदद कर रहे हैं और न ही, जनप्रतिनिधि। 
विकास मिश्रा ने निष्चित एक बेहतर प्रयास किया है। अब देखने वाली बात होगी कि देश के नाम ‘कर्ज’ को उतारने के लिए यह कारवां, और कितना आगे बढता है। इतना जरूर है कि विकास मिश्रा ने अपने दायित्व का परिचय तो दे दिया है, अब बारी हम सब की है।

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

सेवा की मिसाल ‘नारायण सेवा समिति’

जांजगीर-चांपा ( छत्तीसगढ़ ) के षिवरीनारायण की नारायण सेवा समिति, ‘मानव सेवा’ की मिसाल बन गई है। षिवरीनारायण में माघी पूर्णिमा से हर साल शुरू होने वाले प्राचीन मेले में हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं को नारायण सेवा समिति द्वारा प्रसाद स्वरूप भोजन कराया जाता है। भूखे व्यक्तियों की सेवा को ‘नारायण सेवा’ मानकर यह परिपाटी शुरू की गई थी, जो 16 बरसों से जारी है। हर साल 10 हजार से अधिक श्रद्धालु भोजन करते हैं। लोट मारकर भगवान नर-नारायण के दर्षन के लिए पहुंचने वाले भक्तों को दो दिनों तक भोजन कराया जाता है। इसकी सफलता के लिए कई समाजसेवी के साथ ही, स्कूली छात्र-छात्राएं जुटे रहते हैं।
नारायण सेवा समिति के अध्यक्ष राजेष अग्रवाल का कहना है कि 1998 में षिवरीनारायण के कुछ समाजसेवी अमरनाथ यात्रा पर गए थे। इस दौरान वहां दूरस्थ इलाकों से भगवान के दर्षन करने पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भोजन कराने की परिपाटी की जानकारी मिली। इसके बाद षिवरीनारायण में भी इस परिपाटी को माघी पूर्णिमा के अवसर पर शुरू की गई, जो आज भी जारी है। नारायण सेवा समिति के कई सदस्य दो दिनों तक पूरी तन्मयता के साथ जुटे रहते हैं, वहीं षिवरीनारायण के कई उत्साही युवक भी समाजसेवा की भावना से लबरेज होकर भोजन परोसने से लेकर श्रद्धालुओं की अन्य सेवा में जुटे रहते हैं। लोट मारकर मंदिर के पट तक पहुंचने वाले लोगों को भोजन का कूपन दिया जाता है और उन्हें पास ही भोजन स्थल की जानकारी दी जाती है। इस तरह भगवान ‘नर-नारायण’ के दर्षन के बाद श्रद्धालु, भोजन प्राप्त करने पहुंचते हैं।  
माघी पूर्णिमा से शुरू होने वाले षिवरीनारायण मेले की पहचान काफी प्राचीन है। अविभाजित मध्यप्रदेष के समय से ही षिवरीनारायण का 15 दिवसीय मेला, सबसे बड़ा मेला रहा है। छग के निर्माण के बाद भी षिवरीनारायण मेले की वही पहचान आज भी कायम है। महाषिवरात्रि तक मेले में रोजाना लाखों की संख्या में भीड़ जुटती है। षिवरीनारायण की महत्ता इसलिए भी है कि इस धार्मिक नगरी को पुरी के भगवान जगन्नाथ का ‘मूल स्थान’ माना जाता है और किवदंति है कि भगवान जगन्नाथ, माघी पूर्णिमा को एक दिन षिवरीनारायण में विराजते हैं, इसलिए भगवान के दर्षन के लिए भक्तों को सैलाब उमड़ पड़ता है। माघी पूर्णिमा पर चित्रोत्पला महानदी के त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद श्रद्धालु, भगवान नर-नारायण के दर्षन करने पहुंचते हैं। हजारों भक्त ऐसे होते हैं, जो भगवान के द्वार तक लोट मारते पहुंचते हैं और आषीर्वाद प्राप्त करते हैं। खास बात यह भी रहती है कि दूर-दूर से लोट मारकर आने वाले भक्तों के चेहरों में थकान कहीं नजर नहीं आती, इसे वे भगवान की कृपा ही मानते हैं।

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

लघुकथा - जीवन पथ

मैं जिस शहर में रहता हूं, वहां एक नेत्रहीन व्यक्ति है। वे पूरे शहर में खुद ही एक डंडे के सहारे कहीं भी चले जाते हैं। उन्हें इस तरह ‘जीवन पथ’ पर आगे बढ़ते बरसों हो गया। उनकी जिजीविषा देखकर हर कोई हतप्रद रह जाता है। यह तो हम सब कहते रहते हैं कि बेसहारे को सहारे की जरूरत होती है, मगर यह नेत्रहीन व्यक्ति ऐसी सोच रखने वालों के लिए मिसाल है। दरअसल, पिछले दिनों नेत्रहीन व्यक्ति शहर के चौक से गुजर रहा था, इसी दौरान उन्हें सड़क किनारे से आवाज आई कि कोई उसे सड़क पार करा दे। इससे पहले कोई उस असहाय व्यक्ति को पार लगाने आता, उससे पहले ही नेत्रहीन व्यक्ति ने स्वस्फूर्त पहल करते हुए उसे दूसरी छोर पहुंचाया। कथा का तात्पर्य यही है कि किसी को असहाय नहीं समझना चाहिए, मगर जो मदद की अपेक्षा रखते हैं, उन्हें सहायता देने हर समय तैयार रहना चाहिए। ऐसे में नेत्रहीन व्यक्ति का प्रयास निःसंदेह संस्मरणीय है। इससे निश्चित ही सीख मिलती है। यह भी समझ मंे आती है कि यही सबसे बड़ा ‘जीवन पथ’ है।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

पीपल पर अजगरों का बसेरा !

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के भड़ेसर गांव के एक पुराने पीपल पेड़ में सौ से अधिक अजगरों का बसेरा है, वहीं आसपास लोगों के घर भी हैं, परंतु इन सर्पों ने आज तक किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। इनकी इस विशेष प्रवृत्ति और धार्मिक मान्यता को लेकर ग्रामीण पूजा-अर्चना भी करते हैं। एक पेड़ पर इतनी संख्या में अजगरों को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं और जो भी यह बात जानते हैं, उनके बीच यह कौतुहल का विषय हो जाता है। अभी ठंड शुरू होने के साथ ही अजगरों ने पेड़ की खोह से निकलना शुरू कर दिया है। लिहाजा अजगर देखने पहुंचने वाले लोगों का उत्साह देखते ही बनता है।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 15 किमी दूर ग्राम भड़ेसर निवासी महात्मा राम पांडे के खलिहान में सौ साल से भी अधिक पुराना पीपल का पेड़ हैं। यहां पांच दशक से अधिक समय से अजगर जमे हुए हैं। पहले इस पेड़ के खोखर में कुछ ही अजगर थे, लेकिन अब इसकी संख्या में वृहद रूप से इजाफा हुआ है और अजगरों की संख्या अब सौ से अधिक पहुंच गई है। 55 वर्षीय श्री पांडे ने बताया कि जहां पीपल का पेड़ है, वहां पहले उनके परिवार के लोग नहीं रहते थे। दस वर्ष पहले ही पेड़ के पास बने मकान में आकर रहने लगे हैं। इतने वर्षों में उन्होंने अजगरों को कुछ भी खाते नहीं देखा है। हां, तालाब में अजगर रात में विचरण करते हैं। उन्होंने बताया कि अजगरों ने कभी किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया है। पशु-पक्षी व अन्य जानवर पेड़ के आसपास बैठे रहते हैं, लेकिन उन्हें भी अजगर कुछ नहीं करते। वे बताते हैं कि पेड़ के पास दर्जन भर से अधिक मकान हैं और कई खलिहान हैं। यहां अजगर कभी दिन में तो कभी रात में विचरण करते देखे जाते हैं श्री पांडे ने बताया कि पीपल का पेड़ पूरी तरह से खोखला हो गया है और अजगर पेड़ के इस किनारे से निकलते हैं तो कभी उस किनारे से। पहले से अब संख्या बढ़ती जा रही है। शुरूआत में एक-दो ही थे। बाद में पचास से अधिक हो गए और अब यह आंकड़ा सौ को भी पार कर गया है। आसपास गांवों मंे अजगर मिलने पर उसे भी लाकर पेड़ पर रख दिया जाता है। जिसे पेड़ पर पहले से रह रहे अजगर अपना लेते हैं। अजगरों का यह अपनत्व भी लोगों को सोचने पर विवश कर देता है।
भड़ेसर के बुजुर्ग ग्रामीणों का कहना है कि जब से वे जानने-समझने लायक हुए हैं, तब से इस पेड़ पर अजगरों को देखते आ रहे हैं। अजगर, गांव में घूमते रहते हैं और नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं करते। यही कारण है कि लोग, अजगरों को बहुत नजदीक से देखते हैं। वे यह भी बताते हैं कि अजगरों को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। जिले के अलावा छग के अन्य जगहों से भी लोगों का आना होता है और पेड़ पर अजरों का बसेरा देख, वे भौंचक रह जाते हैं। उन्हें सहसा विश्वास ही नहीं होता कि एक साथ इतने अजगर कैसे रह सकते हैं। वैसे सभी अजगर एक साथ नहीं दिखते। बारी-बारी खोखर से बाहर निकलते हैं। कभी चार, कभी छह तो कभी बीस तक अजगरों को देखने का मौका मिलता है।

ठंड में निकलते हैं बाहर
पीपल पेड़ की खोखली शाखाओं से अजगर ठंड के दिनों में ज्यादा बाहर निकलते हैं। गर्मी में रात को बाहर आते हैं। ठंड में ही देखने के लिए भीड़ जुटती है। हर दिन लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। ठंड के मौसम में जैसे ही धूप निकलनी शुरू होती है, वैसे ही अजगर भी धूप सेंकने पेड़ के खोखर से बाहर निकलते हैं। एक-एक कर जब अजगर निकलते हैं तो वह रोमांच भरा नजारा होता है।

‘धनबोड़ा’ मानते हैं ग्रामीण
भड़ेसर के ग्रामीण अजगरों को ‘धनबोड़ा’ मानते हैं। इसी के चलते जहां वे अजगरों की पूजा-अर्चना करते हैं। साथ ही कोई उसे मारता भी नहीं है। ग्रामीणों में आस्था है कि अजगरों के रहने से धन की प्राप्ति होती है और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। ग्रामीण हर विशेष अवसर पर अजगरों की आरती उतारने पहुंचते हैं।

गांव की शान बने अजगर
जिला मुख्यालय से लगे होने के बाद भी ग्राम भड़ेसर की पहचान लोगों के बीच नहीं थी, मगर जब से पीपल पेड़ पर अजगर होने की बात सामने आई है, तब से भडे़सर गांव की प्रसिद्धि दूर-दूर तक हो गई है। यही कारण है कि लोग, अजगरों को गांव की शान समझते हैं। जो भी लोग बाहर से देखने आते हैं, उन्हें उस जगह ग्रामीण पहुंचाने भी जाते हैं।

अजगर एक पालतू प्रजाति का जीव : प्रो केशरवानी
शासकीय एमएमआर पीजी कॉलेज चांपा के जंतु विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. अश्विनी केशरवानी ने बताया कि अजगर, एक पालतू प्रजाति का जीव है। जो अनुकूल वातावरण मिलने से वर्षों तक एक ही स्थान पर रह सकता है। अजगर, विचरण करते समय भोजन की तलाश कर लेते हैं। छोटे जंतुओं को वे निगल जाते हैं अजगर में जहर नहीं मिलता। इससे वे ज्यादा हिंसक नहीं होते। ये अलग बात है कि लोग, अजगर को खाते न देखे हांे, मगर कुछ न कुछ खाते जरूर हैं। वैसे कुछ दिनों तक अजगर मिट्टी खाकर भी जीवित रह सकता है।

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

लघुकथा - चिंटी का सामर्थ्य

वैज्ञानिक युग में हम चांद पर पहुंचकर आसियां बसाने की जितनी बातें कर लें, लेकिन हमारासामर्थ्यकई जंतुओं के मुकाबले कम ही नजर आता है। हम जितना भी विकास कर लें, जितनी भी नई तकनीक के माध्यम से जीवन को सुलभ बना लें, लेकिन उन जैसी सामर्थ्य की शक्ति नहीं ला सकते। यही कारण है कि मनुष्य में पूरा सामर्थ्य तो दिखता है, किन्तु समाज उत्थान की दिशा में यह कोई काम नहीं आता। मनुष्य को 84 लाख योनियों में उच्च स्थान दिया गया है और सोचने-समझने की शक्ति भी दी गई है, लेकिन जो सामर्थ्य का परिचय, उसे देना चाहिए, वह मनुष्य नहीं दे पाता। ऐसी स्थिति में मनुष्य-मनुष्य में सामर्थ्यवान होने की लड़ाई चलती है औरखिसियाई बिल्ली की तरह खंभा नोचेकी तर्ज पर एक-दूसरे के सामर्थ्य को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं।
मनुष्य के सामर्थ्य से इतर एक दूसरा पहलू है, वह चिंटी का सामर्थ्य है। चिंटी में गजब का सामर्थ्य दिखता है। दुनिया में वैसे तो कई अन्य प्राणियों की तरह चिंटी छोटा होता है, परंतु सामर्थ्यवान होने की असली तस्वीर चिंटी में ही दिखाई देती है। जब वह अपने से अधिक वजन के एक-एक अन्न के दाने को ले जाता है और यह सिलसिला तब तक चलते रहता है, जब तक उस स्थान से अंतिम ‘ अन्न का दाना’ खत्म न हो जाए। साथ ही चिंटियों में सामर्थ्य की लड़ाई कहीं दिखाई नहीं देती, वे बस ‘कर्म किए जा, फल की इच्छा न करने पर’ विश्वास करते हैं। फलस्वरूप, जब सामर्थ्यवान होने की तुलना होती है तो चिंटी से मनुष्य, कहीं आगे होता है। केवल बलशाही व बुद्धिजीवी होने का दंभ भरकर, ‘सामर्थ्यवान’ नहीं बना जा सकता है, यही शाश्वत सत्य है।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

‘तुर्रीधाम में पहाड़ का सीना चीर बहती है अनवरत जलधारा’

देश में ऐसे अनेक ज्योतिर्लिंग है, जहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। भक्तों में असीम श्रद्धा भी देखी जाती है। सावन के महीने में शिव मंदिरों की महिमा और ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि इस माह जो भी मन्नतें सच्चे मन से मांगी जाती है, ऐसी मान्यता है, वह पूरी होती हैं। लोगों में भगवान के प्रति अगाध आस्था ही है, जहां हजारों-लाखों की भीड़ खींची चली आती है।
ऐसा ही एक स्थान है, तुर्रीधाम। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के सक्ती क्षेत्र अंतर्गत ग्राम तुर्री स्थित है। यहां भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर है, जहां पहाड़ का सीना चीर अनवरत जलधारा बहती रहती है। खास बात यह है कि यह जलधारा कहां से बह रही है, अब तक पता नहीं चल सका है। आज भी यह शोध का विषय बना हुआ है कि आखिर पहाड़ी क्षेत्रों से पानी का ऐसा स्त्रोत कहां से है, जहां हर समय पानी की धार बहती रहती है।
दिलचस्प बात यह है कि बरसात में जलधारा का बहाव कम हो जाता है, वहीं गर्मी में जब हर कहीं सूखे की मार होती है, उस दौरान जलधारा में पानी का बहाव बढ़ जाता है। इसके अलावा जलधारा के पानी की खासियत यह भी है कि यह जल बरसों तक खराब नहीं होता। यहां के रहवासियों की मानें तो 100 साल बाद भी जल दूषित नहीं होता। यही कारण है कि तुर्रीधाम के इस जल को ‘गंगाजल’ के समान पवित्र माना जाता है और जल को लोग अपने घर ले जाने के लिए लालायित रहते हैं।
एक बात और महत्वपूर्ण है कि शिव मंदिरों में जब भक्त दर्शन करने जाते हैं तो वहां भगवान शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं, मगर यहां कुछ अलग ही है। जलधारा के पवित्र जल को घर ले जाने श्रद्धालुओं में जद्दोजहद मची रहती है तथा वे कोई न कोई ऐसी सामग्री लेकर पहुचंते हैं, जिसमें जल भरकर ले जाया जा सके। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण तुर्रीधाम में दर्शन के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश, झारखंड, उड़ीसा तथा बिहार समेत अन्य राज्यों से भी दर्शनार्थी आते हैं और यहां के मनोरम दृश्य देखकर हतप्रद रह जाते हैं। यहां की अनवरत बहती ‘जलधारा’ सहसा ही किसी को आकर्षित कर लेती हैं। साथ ही लोगों के मन में समाए बगैर नहीं रहता और जो भी एक बार तुर्रीधाम पहुंचता है, वह यहां दोबारा आना चाहता है।
करवाल नाले के किनारे स्थित तुर्रीधाम में भगवान शिव का मंदिर है। यहां अन्य और मंदिर है, जो पहाड़ के उपरी हिस्से में स्थित है। अभी सावन महीने में भी हर सोमवार को ‘तुर्रीधाम’ में हजारों की संख्या में पहुंचे। इस दौरान यहां 15 दिनों का मेला लगता है, जहां मनोरंजन के साधन प्रमुख आकर्षण होता है। महाशिवरात्रि में भी भक्तों की भीड़ रहती है और सावन सोमवार की तरह उस समय भी दर्शन के लिए सुबह से देर रात तक भक्तों की कतार लगी रहती हैं।
किवदंति है कि ‘तुर्रीधाम’ में बरसों पहले एक युवक को सपने में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कुछ मांगने को कहा। उस समय ग्राम - तुर्री में पानी की समस्या रहती थी और गर्मी में हर जगह पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची रहती थी। भगवान शिव को उस युवक ने ‘पानी-पानी’ कहा और एक जलधारा बहने लगी, जिसकी धार अब तक नहीं रूकी है। इसके बाद से यहां भगवान शिव का मंदिर बनवाया गया। इस तरह तुर्री ने एक धाम का रूप ले लिया और भक्तों की श्रद्धा भी बढ़ने लगी। लोगों की भक्ति इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकि तुर्री में पानी की समस्या अब कभी नहीं हुई। साथ ही गर्मी में जलधारा के पानी का बहाव तेज होना भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बना हुआ है।
तुर्रीधाम मंदिर की व्यवस्था समिति के सदस्य कृष्णकुमार जायसवाल ने बताया कि तुर्रीधाम के भगवान शिव के दर्शन से संतान प्राप्ति होती है। इसी के चलते छग के अलावा दूसरे राज्यों बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश समेत अन्य जगहों से भी निःसंतान दंपती भगवान शिव के दर्शनार्थ पहुंचते हैं। तुर्रीधाम में जो जलधारा बहती है, वह प्रकुति उपहार होने के कारण इसे देखने वाले वैसे तो साल भर आते रहते हैं, मगर सावन महीने के हर सोमवार तथा महाशिवरात्रि पर भक्तों की भीड़ हजारों की संख्या में रहती है। अपनी खास विशेषताओं के कारण ही आज ‘तुर्रीधाम’ की छग ही नहीं, वरन देश के अन्य राज्यों में भी अपनी एक अलग पहचान है।